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देवी: भक्त से अभक्त तक की यात्रा (हिंदी पेपरबैक/ई-बुक) – श्रीमती परवीन चौहान

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  1. देवी: भक्त से अभक्त तक की यात्रा(वजूद की तलाश और विश्वास का सफ़र)लेखिका: श्रीमती परवीन चौहानक्या आस्था सिर्फ डर का दूसरा नाम है?किताब के बारे में:यह कहानी किसी कल्पना की नहीं, बल्कि समाज के उस कड़वे यथार्थ की है जो अक्सर बंद दरवाज़ों के पीछे दम तोड़ देती है। ‘देवी’ एक ऐसी लड़की की दास्तान है जो अपने पिता की लाडली थी, जिसकी दुनिया मासूम सवालों और निश्छल आस्था से शुरू हुई थी। बचपन में पिता की उंगली पर लगी चोट को ठीक कराने के लिए भगवान के सामने हाथ जोड़ने वाली वो मासूम बच्ची, जब बड़ी होकर ससुराल की चौखट पर कदम रखती है, तो उसकी पूरी दुनिया बदल जाती है।आसमान में उड़ने की चाह रखने वाली एक आज़ाद चिड़िया को जब रूढ़िवादी परंपराओं, अंतहीन तानों और घूंघट के सख्त पिंजरे में कैद कर दिया जाता है, तब शुरू होता है उसके आत्मसम्मान का असली संघर्ष। दिन-रात बर्तनों के ढेर धोना, अपनों की खातिर सबसे पहले उठना और सबसे बाद में भूखे पेट सो जाना—क्या एक स्त्री का मायका छूटते ही उसका वजूद भी खत्म हो जाता है?जब घोर साधना के बदले सिर्फ चीखें मिलीं…दुखों के इसी बवंडर के बीच, जीवन में एक ऐसे ‘स्वामी जी’ का आगमन होता है जो मौत के मुंह से भी जीवनदान देने का दावा करते हैं। अपने परिवार के कष्टों को दूर करने के लिए देवी, उसकी बहन और बेटी डेढ़ साल तक बिना थके, बिना रुके घोर साधना की भट्टी में जलते हैं। लेकिन नियति का क्रूर मज़ाक तो देखिए… जिस घर में सबसे कठिन साधना हो रही थी, उसी घर में दुखों का सबसे भयानक पहाड़ टूटता है।जब सगी बहन जिंदगी और मौत के बीच अस्पताल के स्ट्रेचर पर सुध-बुध खो बैठती है और एक शहर से दूसरे शहर के डॉक्टरों के चक्कर काटते हुए पूरा परिवार बेबस रोता है… तब देवी के भीतर का विश्वास तार-तार हो जाता है।जब संकट की सबसे गहरी घड़ी में वो चौखट पर खड़ा मौन ईश्वर चुप रह जाता है… तब जन्म लेता है एक विद्रोही!आपको यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए?एक रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्रा: बचपन की नादान आस्था से लेकर, जीवन के कठोर थपेड़ों और अंततः वैचारिक विद्रोह तक का ऐसा सफर, जो आपने पहले कभी नहीं पढ़ा होगा।हर स्त्री के मन की दबी हुई आवाज़: यह पुस्तक समाज और परंपराओं के पीछे छिपे उन अनकहे संघर्षों और सड़ चुके नियमों पर सीधे प्रहार करती है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।सत्य की एक निर्भीक खोज: क्या दुख इंसान को ईश्वर के करीब लाता है या उससे हमेशा के लिए दूर कर देता है? इन्हीं जटिल और झकझोर देने वाले सवालों के जवाब ढूंढती है यह किताब।यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, यह हर उस इंसान के भीतर सोए वजूद की गूँज है जिसने कभी न कभी व्यवस्था और नियति से सवाल किया है। आज ही अपनी प्रति सुरक्षित करें और देवी के इस झकझोर देने वाले सफर का हिस्सा बनें!
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